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Tuesday, 8 April 2025

जैव विविधता का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष उपयोग मूल्य

 जैव विविधता का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष उपयोग मूल्य इस प्रकार है:

प्रत्यक्ष उपयोग मूल्य:

  • यह मूल्य उन संसाधनों से प्राप्त होता है जिनका सीधे उपयोग किया जाता है।
    • भोजन: पौधों, जानवरों और सूक्ष्मजीवों की विभिन्न प्रजातियों से भोजन प्राप्त होता है।
    • औषधि: कई औषधीय पौधे और जानवर बीमारियों के इलाज के लिए उपयोग किए जाते हैं।
    • ईंधन: लकड़ी, गोबर और अन्य जैव संसाधनों का उपयोग ईंधन के रूप में किया जाता है।
    • निर्माण सामग्री: लकड़ी, बांस और अन्य जैव संसाधनों का उपयोग निर्माण में किया जाता है।
    • पर्यटन: प्राकृतिक सुंदरता और वन्यजीवों को देखने के लिए पर्यटन उद्योग जैव विविधता पर निर्भर करता है।

अप्रत्यक्ष उपयोग मूल्य:

  • यह मूल्य उन पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं से प्राप्त होता है जो जैव विविधता प्रदान करती है।
    • वायु और जल शोधन: पौधे और सूक्ष्मजीव वायु और जल से प्रदूषकों को हटाते हैं।
    • जलवायु विनियमन: वन और महासागर कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके जलवायु को स्थिर रखने में मदद करते हैं।
    • परागण: मधुमक्खियां और अन्य जीव पौधों के परागण में मदद करते हैं, जिससे खाद्य उत्पादन बढ़ता है।
    • मिट्टी का निर्माण और संरक्षण: सूक्ष्मजीव और केंचुए मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाते हैं और कटाव को रोकते हैं।
    • प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा: मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियाँ तटीय क्षेत्रों को तूफानों और सुनामी से बचाते हैं।
    • सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्य: कई संस्कृतियों में, जैव विविधता को पवित्र माना जाता है और इसका आध्यात्मिक महत्व होता है।

सतही जल और भूजल

 सतही जल और भूजल के बीच मुख्य अंतर इस प्रकार हैं:

सतही जल (Surface Water):

  • परिभाषा: पृथ्वी की सतह पर पाया जाने वाला पानी, जैसे नदियाँ, झीलें, तालाब, जलाशय, और आर्द्रभूमि।
  • स्रोत: वर्षा, बर्फ पिघलना, और भूजल का सतह पर निकलना।
  • उपलब्धता: आसानी से दिखाई देता है और सुलभ होता है।
  • गुणवत्ता: वायुमंडलीय जमाव और अपवाह के कारण इसमें अधिक प्रदूषक हो सकते हैं। इसलिए, मानव उपयोग से पहले इसे व्यापक उपचार की आवश्यकता हो सकती है। इसमें गाद और निलंबित कण भी अधिक हो सकते हैं।
  • स्थिरता: सूखे के दौरान सूख सकता है, जिससे पानी की आपूर्ति में समस्या आ सकती है।
  • पुनर्भरण: वर्षा और बर्फ पिघलने से अपेक्षाकृत जल्दी पुनर्भरण होता है।
  • उपयोग: पीने के पानी, सिंचाई, उद्योग, बिजली उत्पादन और मनोरंजन के लिए उपयोग किया जाता है।

भूजल (Groundwater):

  • परिभाषा: पृथ्वी की सतह के नीचे चट्टानों और मिट्टी की परतों में जमा पानी। यह संतृप्त क्षेत्रों (aquifers) में पाया जाता है।
  • स्रोत: वर्षा और बर्फ पिघलने का पानी जो मिट्टी और चट्टानों से रिसकर नीचे जाता है।
  • उपलब्धता: सतह पर सीधे दिखाई नहीं देता, इसे कुओं या पंपों के माध्यम से निकालना पड़ता है।
  • गुणवत्ता: मिट्टी और चट्टानों की परतों से गुजरने के कारण आमतौर पर सतही जल की तुलना में अधिक साफ होता है, क्योंकि प्राकृतिक फिल्टरिंग होती है। हालांकि, इसमें कुछ घुले हुए खनिज और भूवैज्ञानिक प्रदूषक हो सकते हैं।
  • स्थिरता: सूखे के दौरान भी आमतौर पर उपलब्ध रहता है, क्योंकि यह धीरे-धीरे समाप्त होता है।
  • पुनर्भरण: सतही जल की तुलना में धीरे-धीरे पुनर्भरण होता है, क्योंकि पानी को जमीन में रिसने में समय लगता है।
  • उपयोग: मुख्य रूप से पीने के पानी की आपूर्ति के लिए उपयोग किया जाता है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। सिंचाई और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए भी उपयोग किया जाता है।

संक्षेप में, सतही जल पृथ्वी की सतह पर आसानी से उपलब्ध पानी है, जबकि भूजल पृथ्वी की सतह के नीचे जमा पानी है। भूजल आमतौर पर सतही जल की तुलना में अधिक साफ होता है लेकिन इसे निकालने के लिए विशेष उपकरणों की आवश्यकता होती है। दोनों ही प्रकार के जल संसाधन महत्वपूर्ण हैं और जल चक्र का अभिन्न अंग हैं।

जल क्षरण के लिए जिम्मेदार कारक

 जल क्षरण के लिए जिम्मेदार कारक निम्नलिखित हैं:

प्राकृतिक कारक:

  • वर्षा: भारी वर्षा और तेज बहाव वाली वर्षा मिट्टी के कणों को बहा ले जाती है।
  • स्थलाकृति: खड़ी ढलान वाली भूमि पर जल का बहाव तेज होता है, जिससे क्षरण अधिक होता है।
  • मृदा का प्रकार: कुछ प्रकार की मिट्टी, जैसे कि रेतीली मिट्टी, दूसरों की तुलना में क्षरण के लिए अधिक संवेदनशील होती हैं।
  • वनस्पति: वनस्पति मिट्टी को बांधे रखती है और जल के बहाव को धीमा करती है, जिससे क्षरण कम होता है। वनस्पति का अभाव क्षरण को बढ़ाता है।
  • जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में बदलाव और अत्यधिक मौसमी घटनाएं जल क्षरण को बढ़ा सकती हैं।

मानवजनित कारक:

  • वनों की कटाई: पेड़ों और अन्य वनस्पतियों को हटाने से मिट्टी उजागर हो जाती है और क्षरण के लिए अतिसंवेदनशील हो जाती है।
  • अतिचारण: पशुओं द्वारा अत्यधिक चराई से वनस्पति नष्ट हो जाती है और मिट्टी दब जाती है, जिससे क्षरण बढ़ता है।
  • अनुचित कृषि पद्धतियाँ: ढलान पर खेती करना, एक ही फसल बार-बार उगाना, और जुताई की गलत विधियाँ मिट्टी की संरचना को कमजोर करती हैं और क्षरण को बढ़ावा देती हैं।
  • शहरीकरण और औद्योगीकरण: निर्माण गतिविधियों और सड़कों के निर्माण से मिट्टी का आवरण हट जाता है और जल का प्राकृतिक बहाव बाधित होता है, जिससे क्षरण बढ़ सकता है।
  • खनन: खनन गतिविधियाँ बड़े पैमाने पर मिट्टी को हटाती हैं और परिदृश्य को बदल देती हैं, जिससे गंभीर क्षरण हो सकता है।
  • सिंचाई की त्रुटिपूर्ण विधियाँ: अत्यधिक सिंचाई या गलत तरीके से सिंचाई करने से जल जमाव हो सकता है और मिट्टी की संरचना खराब हो सकती है, जिससे क्षरण का खतरा बढ़ जाता है।

संक्षेप में, जल क्षरण एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें प्राकृतिक और मानवजनित दोनों कारक योगदान करते हैं। मानव गतिविधियों ने अक्सर प्राकृतिक क्षरण की दर को काफी तेज कर दिया है।

भारत में गैर परंपरागत ऊर्जा संसाधनों की स्थिति का आलोचनात्मक मूल्यांकन

 

भारत में गैर-परंपरागत ऊर्जा संसाधनों की स्थिति का आलोचनात्मक मूल्यांकन इस प्रकार किया जा सकता है:

सकारात्मक पहलू:

  • पर्यावरण के अनुकूल: गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोत जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, और जलविद्युत जीवाश्म ईंधन की तुलना में बहुत कम या शून्य प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। यह जलवायु परिवर्तन और वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए महत्वपूर्ण है।
  • नवीकरणीय: ये स्रोत प्राकृतिक रूप से पुन: उत्पन्न होते हैं, इसलिए वे दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करते हैं और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करते हैं।
  • ऊर्जा सुरक्षा: गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों का विकास देश को ऊर्जा के लिए आयात पर निर्भरता कम करने में मदद करता है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा बढ़ती है।
  • विकेंद्रीकृत ऊर्जा उत्पादन: सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्रोत विकेंद्रीकृत ऊर्जा उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं, जिससे दूरदराज के क्षेत्रों में बिजली पहुंचाना आसान हो जाता है।
  • तकनीकी विकास: भारत ने गैर-परंपरागत ऊर्जा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति की है, खासकर सौर और पवन ऊर्जा में। उत्पादन लागत में कमी आई है और दक्षता में सुधार हुआ है।
  • सरकारी प्रोत्साहन: भारत सरकार ने गैर-परंपरागत ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कई नीतियां और कार्यक्रम शुरू किए हैं, जैसे कि राष्ट्रीय सौर मिशन और राष्ट्रीय पवन ऊर्जा मिशन।
  • लक्ष्य प्राप्ति: भारत ने 2030 तक अपनी संस्थापित विद्युत क्षमता का 40% गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य नवंबर 2021 में ही हासिल कर लिया था।

नकारात्मक पहलू और चुनौतियाँ:

  • उच्च प्रारंभिक लागत: गैर-परंपरागत ऊर्जा परियोजनाओं की प्रारंभिक लागत अक्सर पारंपरिक ऊर्जा परियोजनाओं से अधिक होती है।
  • अस्थिरता: सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्रोत मौसम की स्थिति पर निर्भर करते हैं, जिससे बिजली उत्पादन में अस्थिरता आ सकती है। इसके लिए ऊर्जा भंडारण समाधान की आवश्यकता होती है, जो महंगा हो सकता है।
  • भूमि अधिग्रहण: बड़े पैमाने पर सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में भूमि की आवश्यकता होती है, जिससे भूमि अधिग्रहण एक चुनौती बन सकता है और स्थानीय समुदायों का विरोध हो सकता है।
  • आधारभूत संरचना: गैर-परंपरागत ऊर्जा स्रोतों से उत्पादित बिजली को ग्रिड तक पहुंचाने के लिए मजबूत पारेषण और वितरण नेटवर्क की आवश्यकता होती है, जिसमें और निवेश की आवश्यकता है।
  • वित्तीय बाधाएँ: नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए बैंकों से आसान ऋण सुविधा की अभी भी कमी है। वितरण कंपनियों द्वारा भुगतान में देरी और विद्युत खरीद समझौतों में पुनः मोलभाव जैसी चिंताएँ भी हैं।
  • आयात पर निर्भरता: भारत अभी भी नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों के लिए चीन और जर्मनी जैसे देशों से आयात पर निर्भर है, जिससे प्रणाली लागत बढ़ जाती है।
  • अनुसंधान और विकास: नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अनुसंधान और आधुनिक विकास सुविधाओं की अभी भी कमी है।
  • जागरूकता की कमी: आम जनता के बीच गैर-परंपरागत ऊर्जा के लाभों और उपयोग के बारे में जागरूकता की कमी है, जिससे इसे अपनाने की गति धीमी है।
  • बायोमास ऊर्जा की चुनौतियाँ: बायोमास ऊर्जा के लिए ईंधन एकत्र करने में कठिनाई और खाना बनाते समय प्रदूषण जैसी समस्याएं हैं।

निष्कर्ष:

भारत में गैर-परंपरागत ऊर्जा संसाधनों में अपार संभावनाएं हैं और देश ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। यह ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और दूरदराज के क्षेत्रों के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, उच्च प्रारंभिक लागत, अस्थिरता, भूमि अधिग्रहण, आधारभूत संरचना और वित्तीय बाधाओं जैसी चुनौतियों का समाधान करना होगा ताकि इन स्रोतों का पूरी क्षमता से उपयोग किया जा सके। सरकार, उद्योग और अनुसंधान संस्थानों को मिलकर काम करने की आवश्यकता है ताकि इन चुनौतियों का समाधान किया जा सके और भारत को एक स्थायी और स्वच्छ ऊर्जा भविष्य की ओर ले जाया जा सके।

Saturday, 5 April 2025

कृषि क्षेत्र का मशीनीकरण

    भारत में कृषि क्षेत्र के मशीनीकरण में, जो एक समय में मुख्यतः ट्रैक्टरों के उपयोग पर आधारित था, वर्तमान में आमूलचूल परिवर्तन हो रहे हैं। आधुनिक कृषि मांगों को पूरा करने के लिये स्मार्ट मशीनरी, स्वचालन और सटीक उपकरणों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
कृषि क्षेत्र का मशीनीकरण क्या है?

    कृषि क्षेत्र के मशीनीकरण के अंतर्गत उत्पादकता में सुधार, दक्षता में वृद्धि, तथा कृषि कार्यों में शारीरिक श्रम पर निर्भरता कम करने के लिये हार्वेस्टर और आधुनिक उपकरणों जैसी मशीनों का उपयोग करना शामिल है।


कृषि क्षेत्र के मशीनीकरण में उभरती प्रौद्योगिकियाँ:

परिशुद्ध कृषि: परिशुद्ध कृषि में मृदा और जलवायु स्थितियों के आधार पर संसाधन उपयोग (जल, उर्वरक, पीड़कनाशी) को अनुकूलित करने के लिये GPS, IoT, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन और डेटा एनालिटिक्स का उपयोग किया जाता है।
कृषि में ड्रोन: ड्रोन का उपयोग फसल निगरानी, पीड़कनाशी के छिड़काव और उपज अनुमान के लिये किया जाता है। वैश्विक ड्रोन आयात में भारत की हिस्सेदारी 22% है।
    ड्रोन दीदी योजना का उद्देश्य महिला स्वयं सहायता समूहों को किराये की सेवाएँ प्रदान करने, मशीनीकरण और ग्रामीण रोज़गार को बढ़ावा देने के लिये 15,000 ड्रोन उपलब्ध कराना है।
स्वायत्त मशीनरी: चालक रहित ट्रैक्टर और रोबोट हार्वेस्टर मानव की न्यूनतम आवश्यकता के साथ बीजारोपण, छिड़काव और कटाई जैसे कार्य करते हैं।
कृषि रोबोटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता: कृषि क्षेत्र में रोबोटों के उपयोग से बुवाई, सिंचाई, निराई और कटाई में स्वंयचालित क्रिया सक्षम हुई है, जिससे लागत कम हुई है और दक्षता में वृद्धि हुई है।
कृषि क्षेत्र के मशीनीकरण का स्तर: भारत में कृषि क्षेत्र के मशीनीकरण का कुल स्तर लगभग 47% है। पंजाब और हरियाणा में 40-45% मशीनीकरण है, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों में मशीनीकरण नगण्य है।
    गेहूँ और चावल जैसी अनाज फसलों में लगभग 50-60% योगदान मशीनीकरण का है, जबकि बागवानी में मशीनों का उपयोग कम है।
वैश्विक स्तर: वैश्विक स्तर पर, विकसित देशों में मशीनीकरण का स्तर 90% से अधिक है, जबकि अविकसित क्षेत्र, विशेष रूप से अफ्रीका और दक्षिण एशिया, वर्तमान में भी शारीरिक श्रम पर निर्भर हैं। विकासशील देशों में चीन (60%) और ब्राज़ील (75%) अग्रणी हैं।
 
कृषि क्षेत्र के मशीनीकरण का मुख्य महत्त्व क्या है?

    इनपुट बचत: ICAR की एक रिपोर्ट के अनुसार, कृषि क्षेत्र में मशीनों का उपयोग करने से बीज और उर्वरकों पर 15-20% की बचत होती है, जिससे इनपुट लागत कम हो जाती है, जबकि फसल की गहनता 5-20% बढ़ जाती है।



उच्च दक्षता: इससे श्रम दक्षता में भी सुधार होता है और कृषि कार्य समय में 15-20% की कटौती होती है, जिससे कृषि में उत्पादकता और संधारणीयता बढ़ती है।
भूमि का कुशल उपयोग: रोटावेटर और सबसॉइलर जैसे उन्नत जुताई उपकरण सघन मृदा को भुरभुरा बना कर कठोर भूमि को कृषि योग्य बनाते हैं, इसी प्रकार यंत्रीकृत सिंचाई से जल का कुशल उपयोग सुनिश्चित होता है, तथा शुष्क या असमान भूभाग भी उत्पादक कृषि भूमि में परिवर्तित हो जाती है।
 
भारत में कृषि क्षेत्र के मशीनीकरण की क्या आवश्यकता है?

खाद्य की बढ़ती मांग: भारत की जनसंख्या वर्ष 2048 तक 1.6 बिलियन होने और वर्ष 2050 तक वैश्विक खाद्य मांग में 60% की वृद्धि (FAO) होने की उम्मीद के साथ, सीमित भूमि, जल अभाव, मानसून पर निर्भरता और अल्प मशीनीकरण संधारणीय कृषि विकास के समक्ष चुनौतियाँ हैं।
अल्प कुशल कृषि: भारत की 46.1% आबादी कृषि में संलग्न है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25) में इसका योगदान केवल 16% है, जो अक्षमताओं को उजागर करता है। मशीनीकरण की सहायता से उत्पादकता बढ़ाकर, कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करके और संधारणीयता सुनिश्चित करके इस अंतराल को कम किया जा सकता है।
श्रम अभाव और नगरीकरण: संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, वर्ष 2050 तक भारत की 50% से अधिक आबादी नगरों में निवास करेगी, जिससे कृषि श्रम की उपलब्धता कम हो जाएगी। अन्य क्षेत्रों में उभरते अवसर और मनरेगा जैसी योजनाओं से कार्यबल का प्रवास और अधिक तीव्र हो गया है। कृषि उत्पादकता को बनाए रखने के लिये मशीनीकरण आवश्यक है।
सिंचाई संबंधी चुनौतियाँ: भारत की केवल 53% कृषि योग्य भूमि ही सिंचाई के अंतर्गत है, अतः वर्षा आधारित कृषि जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील बनी हुई है। मशीनीकरण से समय पर बुवाई और कटाई सुनिश्चित होती है, जिससे कार्यकुशलता बढ़ती है और जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में फसल की क्षति कम होती है।
 
कृषि मशीनीकरण में वैश्विक रुझान

कनाडा और अमेरिका: यहाँ इनमें 95% मशीनीकरण है, तथा ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और जुताई उपकरणों में भारी पूंजी निवेश किया गया है। संयुक्त राज्य अमेरिका में अब एक किसान 144 लोगों को भोजन उपलब्ध कराता है, जबकि वर्ष 1960 में यह संख्या 26 थी। सरकारी सहायता में कम ब्याज वाले ऋण, प्रत्यक्ष सब्सिडी और मूल्य समर्थन शामिल हैं।
फ्राँस: यहाँ मशीनीकरण 99% है, यहाँ 680,000 उच्च मशीनीकृत जोत हैं और कृषि उपकरण बाज़ार का मूल्य 6.3 बिलियन यूरो है। किसानों को यूरोपीय संघ से 50% आय के बराबर सब्सिडी मिलती है, जो निर्यात और मशीनरी आयात को सहायता प्रदान करती है।
जापान: यहाँ मशीनीकरण उच्च है, प्रति हेक्टेयर 7 HP ट्रैक्टर की शक्ति है, जो अमेरिका और फ्राँस के समतुल्य है। यह घरेलू कृषि की सुरक्षा के लिये सब्सिडी और उच्च आयात शुल्क प्रदान करता है।
 
भारत में कृषि मशीनीकरण में क्या चुनौतियाँ हैं?

    लघु एवं खंडित भूमि जोत: भारत में औसत कृषि आकार 1.16 हेक्टेयर है (यूरोपीय संघ में 14 हेक्टेयर और अमेरिका में 170 हेक्टेयर की तुलना में), छोटे किसानों के लिये मशीनीकरण आर्थिक रूप से अव्यवहारिक बना हुआ है। लघु, खंडित जोतों के लिये मशीनरी की कमी मशीनीकरण को सीमित करती है।
    लघु जोतों (<2 हेक्टेयर) में पावर टिलर का उपयोग किया जाता है; मध्यम जोतों (2-10 हेक्टेयर) में 30-50 HP ट्रैक्टर और रोटावेटर का उपयोग किया जाता है; वृहद् जोतों (>10 हेक्टेयर) में कंबाइन हार्वेस्टर और लेजर लैंड लेवलर जैसे उन्नत उपकरण अपनाए जाते हैं।
वित्तीय बाधाएँ: कृषि मशीनरी महँगी हैं, और सीमित वित्तीय पहुँच के कारण छोटे किसान इसे वहन करने में संघर्ष करते हैं। यद्यपि 90% ट्रैक्टरों को वित्तपोषित किया जाता है, लेकिन सख्त ऋण मानदंड और उच्च लागत के कारण मशीनीकरण कठिन हो जाता है।
उपकरण की निम्न गुणवत्ता: भारतीय किसानों के पास उन्नत मशीनरी तक सीमित पहुँच है, और उपलब्ध अधिकांश उपकरण निम्न गुणवत्ता के हैं, जिससे उच्च परिचालन लागत और अक्षमता होती है।
क्षेत्रीय असमानताएँ: पर्वतीय कृषि (कृषि योग्य भूमि का 20%) और सुदूरवर्ती क्षेत्रों में भौगोलिक चुनौतियों, उपयुक्त उपकरणों की कमी और कमज़ोर नीतिगत समर्थन के कारण मशीनीकरण कम है।
 
कृषि मशीनीकरण को बढ़ावा देने के लिये सरकारी पहल
  • कृषि मशीनीकरण पर उप मिशन (SMAM)
  • कृषि अवसंरचना कोष (AIF)
  • कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC)
  • जलवायु अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (NICRA)
  • मेक इन इंडिया एवं कृषि मशीनरी में FDI
आगे की राह.........

भूमि चकबंदी और कस्टम हायरिंग: कुशल मशीनीकरण के लिये भूमि चकबंदी को प्रोत्साहित करना और छोटे किसानों को कम्बाइन हार्वेस्टर और चावल ट्रांसप्लांटर जैसी महँगी मशीनरी उपलब्ध कराने के लिये कस्टम हायरिंग केंद्रों (CHC) को मज़बूत करना।
प्रौद्योगिकी और वित्तीय पहुँच: कम मशीनीकरण वाले क्षेत्रों में कृषि मशीनरी बैंकों की स्थापना करते हुए कृषि मशीनरी अपनाने के लिये सब्सिडी, कम ब्याज दर पर ऋण और कर प्रोत्साहन सुनिश्चित करना।
अनुसंधान एवं विकास, मानकीकरण एवं प्रशिक्षण: किसान-उद्योग सहयोग को बढ़ावा देना, गुणवत्ता मानकों एवं परीक्षण को लागू करना, तथा कुशल मशीनरी उपयोग एवं रखरखाव के लिये प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना।समावेशी मशीनीकरण: सभी क्षेत्रों में मशीनीकरण के लाभ को बढ़ाने के लिये पर्वतीय, वर्षा आधारित और बागवानी कृषि के लिये विशिष्ट मशीनरी का विकास करना।
 

Wednesday, 2 April 2025

भारत में कपास उत्पादन में गिरावट

 

भारत, जो कभी विश्व का सबसे बड़ा कपास उत्पादक और निर्यातक था, कपास उत्पादन में तीव्र गिरावट का सामना कर रहा है, जिसका मुख्य कारण तकनीकी प्रगति का अभाव और नीतिगत निष्क्रियता है।

 

 भारत में कपास उत्पादन में गिरावट के क्या कारण हैं?

  • प्रारंभिक वृद्धि: 1970 के दशक में सी.टी. पटेल और बी.एच. कटारकी जैसे भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित संकर कपास किस्मों ने पैदावार में उल्लेखनीय सुधार किया है।
    • बीटी (बैसिलस थुरिंजिएंसिस) कपास, जिसे वर्ष 2002-03 में प्रवर्तित किया गया था, में अमेरिकन बॉलवर्म जैसे कीटों से सुरक्षा के लिये बैसिलस थुरिंजिएंसिस जीवाणु के जीन का उपयोग किया गया था। 
      • वर्ष 2013-14 तक इसने भारत के 95% से अधिक कपास क्षेत्र को कवर कर लिया, जिससे उपज दोगुनी होकर 566 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई। इससे भारत को वर्ष 2015-16 तक विश्व का शीर्ष कपास उत्पादक और प्रमुख निर्यातक बनने में मदद मिली।
  • सफलता के बाद स्थिरता: बीटी और बोल्गार्ड-II प्रौद्योगिकियों की सफलता के बावजूद, भारत ने वर्ष 2006 के बाद से किसी भी नई आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) फसल कपास की किस्मों को मंजूरी नहीं दी है।
    • भारतीय संस्थानों द्वारा विकसित व्हाइटफ्लाई और पिंक बॉलवार्म प्रतिरोधी कपास जैसे स्वदेशी नवाचार अभी भी नियामक अनिश्चितता में फंसे हुए हैं। 
    • आनुवंशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (GEAC) की मंजूरी के बावजूद बीटी बैंगन पर वर्ष 2010 में लगाई गई रोक ने अन्य GM फसलों के क्षेत्र परीक्षणों को रोकने के लिये एक उदाहरण प्रस्तुत किया, जिससे कपास उत्पादन में सुधार के लिये नई प्रौद्योगिकियों के प्रयोग में बाधा उत्पन्न हुई।
  • संक्रमण: भारत में कपास उत्पादन में गिरावट मुख्य रूप से पिंक बॉलवर्म (PBW) के बढ़ते संक्रमण के कारण है। प्रारंभ में, बीटी कपास ने कीट नियंत्रण में प्रभावी भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ, PBW ने बीटी प्रोटीन के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लिया। 
    • यह कीट अब बुवाई के 40-45 दिन बाद ही फसलों को संक्रमित कर देता है तथा बीजकोषों और पुष्पों को नुकसान पहुँचाता है। 
    • बीटी कपास की विशेष कृषि ने इस प्रतिरोध को बढ़ावा दिया है, जिसके कारण कपास लिंट की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में महत्त्वपूर्ण कमी आई है।
  • उत्पादन पर प्रभाव: भारत का कपास उत्पादन, जो वर्ष 2013-14 में 39.8 मिलियन गाँठ तक पहुँच गया था, वर्ष 2024-25 तक घटकर 29.5 मिलियन गाँठ हो गई है, और पैदावार 450 किलोग्राम/हेक्टेयर से नीचे गिर गई, जो चीन जैसे वैश्विक राष्ट्रों (1993 किलोग्राम/हेक्टेयर) की तुलना में काफी कम है।


 कपास उत्पादन में गिरावट के संबंध में चिंताएँ क्या हैं?

  • आयात पर बढ़ती निर्भरता: कपास का आयात वर्ष 2023-24 में 518.4 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 1.04 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जबकि निर्यात 729.4 मिलियन अमेरिकी डॉलर से घटकर 660.5 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया।
    • उत्पादन में गिरावट के कारण भारत की व्यापारिक स्थिति परिवर्तित हो गई, आयात निर्यात से अधिक हो गया, जिससे वैश्विक कपास बाज़ार में इसकी पिछली प्रतिस्पर्द्धात्मक बढ़त समाप्त हो गई।
  • विरोधाभासी व्यापार और तकनीकी नीतियाँ: राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान जैसे प्रमुख संस्थानों से स्वदेशी GM नवाचारों में देरी हुई है अथवा उनकी उपेक्षा की गई है।
    • यद्यपि GM फसलों के क्षेत्र परीक्षण अवरुद्ध हैं, तथापि भारत ने वर्ष 2021 में GM  सोयामील के आयात की अनुमति दे दी है।
    • GM फसलों पर रोक और विनियामक स्पष्टता के अभाव से कपास क्षेत्र में नवाचार बाधित हुआ है। विनियामक निर्णय वैज्ञानिक जोखिम मूल्यांकन पर आधारित न होकर जन भावना और विधिक हस्तक्षेप पर केंद्रित हो गए हैं।
  • वैश्विक बाज़ारों में छूटे अवसर: अमेरिका और ब्राज़ील जैसे देश, व्यापक स्तर पर जैवप्रौद्योगिकी को अपनाकर, निर्यात के उस क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर रहे हैं, जिस पर पूर्व में भारत का प्रभुत्व था।
    • घरेलू वस्त्र उद्योग वर्तमान में विदेशों से कपास की खरीद कर रहे हैं, जिससे इनपुट लागत बढ़ रही है और प्रतिस्पर्द्धा कम हो रही है।
  • कपास के तेल में गिरावट: कपास के बीज खाद्य तेल उत्पादन में योगदान देते हैं, जिससे यह सरसों और सोयाबीन के बाद भारत में तीसरा सबसे बड़ा वनस्पति तेल स्रोत बन गया है।
    • कपास उत्पादन में कमी से तेल उत्पादन प्रभावित होता है, जिससे भारत की खाद्य तेल आयात पर निर्भरता बढ़ जाती है।

नोट: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) के अंतर्गत कपास विकास कार्यक्रम का उद्देश्य प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में कपास उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ावा देना है और इसे वर्ष 2014-15 से कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है।

भारत में कपास उत्पादन बढ़ाने के लिये क्या किया जा सकता है?

  • तकनीकी हस्तक्षेप: कीट प्रतिरोधी और उच्च उपज देने वाली GM कपास संकर किस्मों (जैसे, श्‍वेत मक्षी-रोधी और पिंक बॉलवर्म-रोधी किस्में) को शीघ्रता से विनियामक स्वीकृति प्रदान किये जाने की आवश्यकता है।
  • उच्च घनत्व रोपण प्रणाली (HDPS) को बढ़ावा देना: प्रति इकाई क्षेत्र में पौधों की संख्या बढ़ाने और उपज में सुधार करने के लिये कपास उत्पादक राज्यों में HDPS को अपनाने को बढ़ावा देना चाहिये।
  • किसान-केंद्रित विस्तार सेवाएँ: MSP, मौसम, कीट अलर्ट और खरीद लॉजिस्टिक्स पर वास्तविक समय में अपडेट प्रदान करने हेतु कॉट-एली जैसे प्लेटफॉर्मों का विस्तार किये जाने की आवश्यकता है।
    • सर्वोत्तम कृषि पद्धतियों के प्रसार के लिये कृषि विज्ञान केंद्रों और भारतीय कपास निगम के माध्यम से कृषि विस्तार को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
  • पश्च फसल और बाज़ार सुधार: वैश्विक बाज़ारों में गुणवत्ता आश्वासन सुनिश्चित करने के लिये क्यूआर-कोड ट्रेसेबिलिटी के साथ “कस्तूरी कॉटन” ब्रांडिंग का विस्तार करने की आवश्यकता है।
    • कपास उत्पादकता के लिये पाँच वर्षीय मिशन (बजट 2025-26 में घोषित) को क्रियान्वित करने की आवश्यकता है, जिससे उपज में वृद्धि हो, संधारणीयता सुनिश्चित हो, तथा अतिरिक्त-लंबे स्टेपल कपास की खेती (जो अपनी बेहतर गुणवत्ता, कोमलता और स्थायित्व के लिये जाना जाता है) को बढ़ावा मिले, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो।
    • समग्र क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करने के लिये कपास क्लस्टरों से जुड़े कताई, बुनाई और परिधान क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित किये जाने की आवश्यकता है।

 

स्रोत:इंडियन एक्सप्रेस

 

Tuesday, 1 April 2025

एग्रीवोल्टेइक परियोजना

एग्रीवोल्टेइक परियोजना: कृषि और ऊर्जा का संगम

  उत्तर प्रदेश ‘एग्रीवोल्टेइक’ परियोजना को अपनाने वाला भारत का पहला राज्य बन गया है। 

 एग्रीवोल्टेइक परियोजना, जिसे एग्री-वोल्टेइक सिस्टम (Agri-Voltaic System) भी कहा जाता है, एक नवोन्मेषी दृष्टिकोण है जो एक ही भूमि पर कृषि उत्पादन और सौर ऊर्जा उत्पादन को संयोजित करता है। यह न केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देता है बल्कि कृषि भूमि उपयोग को भी अनुकूलित करता है। वर्तमान में जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट के दौर में, एग्रीवोल्टेइक परियोजना एक टिकाऊ समाधान के रूप में उभर रही है।

एग्रीवोल्टेइक परियोजना कैसे काम करती है?

एग्रीवोल्टेइक सिस्टम में, सौर पैनलों को खेतों के ऊपर इस तरह से स्थापित किया जाता है कि फसलें अभी भी पर्याप्त धूप प्राप्त कर सकें। यह कई तरीकों से किया जा सकता है:

  • ऊंचे फ्रेम पर सौर पैनल: पैनलों को जमीन से काफी ऊपर उठाया जाता है, ताकि कृषि मशीनरी आसानी से नीचे से गुजर सके।
  • पारदर्शी या अर्ध-पारदर्शी पैनल: ये पैनल कुछ मात्रा में धूप को फसलों तक पहुंचने देते हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया जारी रहती है।
  • रोटेटिंग पैनल: कुछ सिस्टम में, पैनलों को दिन के दौरान इस तरह घुमाया जाता है कि वे अधिकतम धूप को कैप्चर करें, जबकि फसलों को भी उचित धूप मिले।

एग्रीवोल्टेइक परियोजना के लाभ:

  • भूमि का अधिकतम उपयोग: एक ही भूमि पर कृषि और ऊर्जा उत्पादन दोनों संभव हैं, जिससे भूमि की उपयोगिता बढ़ जाती है।
  • पानी का संरक्षण: सौर पैनलों की छाया के कारण मिट्टी से पानी का वाष्पीकरण कम होता है, जिससे पानी की बचत होती है और फसलों को कम सिंचाई की आवश्यकता होती है।
  • फसल सुरक्षा: पैनलों से फसलों को तेज धूप, ओलावृष्टि और अत्यधिक बारिश से बचाया जा सकता है, जिससे फसल की गुणवत्ता और पैदावार में सुधार हो सकता है।
  • ऊर्जा उत्पादन: सौर पैनल स्वच्छ ऊर्जा उत्पन्न करते हैं, जिससे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती है और कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलती है।
  • किसानों की आय में वृद्धि: ऊर्जा उत्पादन से किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।
  • स्थानीय रोजगार: एग्रीवोल्टेइक परियोजनाओं से निर्माण, संचालन और रखरखाव के क्षेत्र में स्थानीय रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।

चुनौतियां:

  • उच्च प्रारंभिक लागत: एग्रीवोल्टेइक सिस्टम स्थापित करने की लागत पारंपरिक कृषि या सौर ऊर्जा परियोजनाओं से अधिक हो सकती है।
  • तकनीकी जटिलता: सिस्टम डिजाइन और स्थापना के लिए विशेष ज्ञान और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
  • फसल चयन: सभी फसलें एग्रीवोल्टेइक सिस्टम के तहत अच्छी तरह से नहीं बढ़ती हैं, इसलिए फसलों का चयन सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।
  • सौर पैनलों की छाया: सौर पैनलों की छाया के कारण कुछ क्षेत्रों में फसल की वृद्धि प्रभावित हो सकती है।

निष्कर्ष:

एग्रीवोल्टेइक परियोजना एक आशाजनक समाधान है जो कृषि और ऊर्जा के क्षेत्र में क्रांति ला सकती है। हालांकि कुछ चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन इसके लाभ इसे भविष्य के लिए एक टिकाऊ और आकर्षक विकल्प बनाते हैं। सरकार और निजी क्षेत्र दोनों को इस अभिनव तकनीक को बढ़ावा देने और इसे व्यापक रूप से अपनाने के लिए निवेश करना चाहिए, ताकि कृषि और ऊर्जा सुरक्षा दोनों सुनिश्चित की जा सके। एग्रीवोल्टेइक परियोजना न केवल स्वच्छ ऊर्जा प्रदान करती है, बल्कि यह किसानों की आय बढ़ाने, पानी बचाने और जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मदद करती है। यह वास्तव में कृषि और ऊर्जा का एक सफल संगम है।

 

 

मुख्य बिंदु

  • एग्रीवोल्टेइक प्रणाली
    • एग्रीवोल्टाइक प्रणाली, जिसे कृषि-वोल्टीय प्रणाली या "सौर-खेती" भी कहा जाता है, एक नई तकनीक है जिसमें किसान अपनी फसलों के उत्पादन के साथ-साथ बिजली का उत्पादन भी कर सकते हैं। 
    • इस प्रणाली में फोटो-वोल्टाइक (PV) तकनीक का उपयोग करके कृषि योग्य भूमि पर सौर पैनल स्थापित किये जाते हैं। 
    • यह तकनीक पहली बार वर्ष 1981 में एडॉल्फ गोएट्ज़बर्गर और आर्मिन ज़ास्ट्रो द्वारा पेश की गई थी। 2004 में जापान में इसका प्रोटोटाइप विकसित किया गया और कई परीक्षणों के बाद 2022 में पूर्वी अफ्रीका में इसे लागू किया गया। 
    • वर्तमान में भारत, अमेरिका, फ्राँस, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों में इसका सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। 
      • हालांकि, भारत में यह तकनीक अभी अपने प्रारंभिक चरण में है।
  • लाभ
    • बढ़ती ऊर्जा की मांग और खाद्य सुरक्षा की समस्याओं का समाधान।
    • सौर पैनल से फसलों की वाष्पन दर कम और जल का बेहतर उपयोग।
    • सौर पैनल से फसलों को उच्च तापमान और UV किरणों से सुरक्षा।
    • सौर ऊर्जा से बिजली की लागत में कमी और किसानों की आय में वृद्धि।
    • बारिश का पानी सौर पैनल से एकत्र और सिंचाई के लिये उपयोग।
  • चुनौतियाँ
    • यह एक भूमि-आधारित प्रणाली है, जिसमें प्रति मेगावाट उत्पादन के लिये लगभग दो हेक्टेयर ज़मीन की आवश्यकता होती है।
    • बरसाती मौसम में जब आकाश में बादल होते हैं, तब यह प्रणाली उतनी प्रभावी नहीं रहती है और किसानों को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।
    • सौर पैनल से उत्पन्न छाया कभी-कभी पौधों में पीड़क का कारण बन सकती है, जिससे फसलों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है।
  • एडीबी से अनुदान:
    • वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग ने “उत्तर प्रदेश में एग्रीवोल्टेइक परियोजनाओं का प्रदर्शन” शीर्षक वाले राज्य सरकार के तकनीकी सहायता प्रस्ताव को मंजूरी दी है। 
    • इसके तहत एशियाई विकास बैंक (ADB) से 0.50 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹4.15 करोड़) की तकनीकी सहायता स्वीकृत हुई है।
    • उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बन गया है, जिसे ADB से इस प्रकार की आर्थिक सहायता मिली है।
  • महत्त्व
    • इस परियोजना के तहत एक ही ज़मीन पर कृषि उत्पादन के साथ सौर ऊर्जा का भी उत्पादन होता है। 
    • इससे किसानों को अतिरिक्त आय मिलेगी, ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा और सतत् विकास को बढ़ावा मिलेगा। 
    • यह पहल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, पर्यावरण संरक्षण और सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है।

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