वारंट मामले का परीक्षण एक कानूनी प्रक्रिया है जो गंभीर अपराधों के लिए होती है, जिनमें दो साल से अधिक कारावास, आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सजा हो सकती है। वारंट मामले के परीक्षण की प्रक्रिया दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में निर्धारित है।
वारंट मामले का परीक्षण:
वारंट मामले का परीक्षण दो प्रकार का होता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि मामला पुलिस रिपोर्ट के आधार पर शुरू किया गया है या किसी और तरीके से।
1. पुलिस रिपोर्ट पर आधारित वारंट मामले का परीक्षण:
- आरोप तय करना: अदालत अभियोजन पक्ष और अभियुक्त की बात सुनने के बाद आरोप तय करती है।
- अभियोजन साक्ष्य: अभियोजन पक्ष अपने गवाहों और सबूतों को पेश करता है।
- अभियुक्त का बचाव: अभियुक्त को अपने बचाव में गवाहों और सबूतों को पेश करने का मौका मिलता है।
- अंतिम बहस: दोनों पक्ष अपनी अंतिम बहस पेश करते हैं।
- निर्णय: अदालत सबूतों और बहस के आधार पर फैसला सुनाती है।
2. पुलिस रिपोर्ट के अतिरिक्त वारंट मामले का परीक्षण:
- परिवाद पर संज्ञान: इस प्रकार के मामले में मजिस्ट्रेट परिवाद पर संज्ञान लेते हैं।
- परिवादी एवं साक्षियों की परीक्षा: मजिस्ट्रेट परिवादी एवं साक्षियों की परीक्षा करते हैं।
- अभियुक्त पर आरोप: यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि अभियुक्त ने अपराध किया है, तो वे आरोप तय करते हैं।
- अभियोजन साक्ष्य एवं अभियुक्त का बचाव: इसके पश्चात अभियोजन साक्ष्य एवं अभियुक्त के बचाव की प्रक्रिया पुलिस रिपोर्ट पर आधारित वारंट मामले के परीक्षण के समान होती है।
- अंतिम बहस एवं निर्णय: दोनों पक्ष अंतिम बहस करते हैं एवं न्यायालय निर्णय देता है।
मुख्य अंतर:
- पुलिस रिपोर्ट पर आधारित मामले में, पुलिस जांच करती है और अदालत में चार्जशीट पेश करती है।
- पुलिस रिपोर्ट के अतिरिक्त मामले में, शिकायतकर्ता सीधे अदालत में शिकायत दर्ज करता है।
वारंट मामले का परीक्षण एक जटिल प्रक्रिया है, और यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि अभियुक्त को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार मिले।
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